Friday, June 5, 2009

उन्‍होंने पर्यावरण को बचा लिया

उन्‍हें यह भ्रम है कि पेड़ लगाए जाते हैं और मैं कोई पर्यावरण बचाओ आंदोलन चलाने वाला व्‍यक्ति हूं। अक्‍सर कहा जाता है "वृक्षारोपण कार्यक्रम" .... मुझे लगता है कि यह पौधरोपण कार्यक्रम है। पौधा लगाया जाता है न कि पेड़।

खैर... मैंने विनम्रता से मना कर दिया कि मैं उनके "पेड़ लगाने" के कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सकता क्‍योंकि वे गांरटी नहीं दे पाए कि लगाए गए पौधों की रक्षा की जाएगी और वे पेड़ बनेंगे। मैं अपने लगाए पौधों को पेड़ बनाने के लिए उनकी रक्षा भी करता हूं।

मैंने उनसे पूछा कि वो इस बारे में क्‍या कर रहे हैं? तो उनके पास कोई जवाब नहीं था।
उन्‍होंने एक सवाल पूछा मेरे अकेले के करने से क्‍या होगा?


पांच जून एक भद्दा मजाक बन चुका है। 37 साल से इस दिन कितने झूठ बोले जाते हैं दिखावे किए जाते हैं लेकिन सच्‍चाई बहुत कड़वी है। मैं कुछ भयावह से आंकड़े पेश कर सकता हूं पर कोई फायदा नहीं है। सब जानते हैं।

उन्‍होंने मुझसे पूछा कि मैं क्‍या कर रहा हूं ... बताने की बाध्‍यता नहीं थी लेकिन मैंने उन्‍हें बताया कि बस इतना कर रहा हूं ...

पॉलीथिन बैग्‍स का इस्‍तेमाल आमतौर पर नहीं करता।
ब्रश और शेव करते वक्‍त वाश बेसिन का नल चालू नहीं रखता।
कमरे से बाहर जाते समय बिजली का लट्टू और पंखे को चालू नहीं छोड़ता।
अपने दोपहिया वाहन की नियमित जांच करवा कर उसे प्रदूषणमुक्‍त रखने का प्रयास करता हूं।
आज तक जितने पौधे लगाए उन्‍हें जीवित रखने की‍ जिम्‍मेदारी भी निभाता हूं।

और यह सब मैं किसी पर्यावरण आंदोलन को चलाने के लिए नहीं करता बल्‍ि‍क इसलिए कर रहा हूं क्‍यों कि यह मेरी जिम्‍मेदारी है। इतना तो करना ही पड़ेगा... पर्यावरण के लिए नहीं अपनी खातिर।

उन्‍होंने आज पेड़ लगाए हैं कल अखबार में उनका फोटो छपेगा।
यानि पर्यावरण को उन्‍होंने बचा लिया।

Friday, September 19, 2008

प्रवासी जल पक्षियों की प्रजातियां खत्‍म होने के करीब

मानव द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के साथ छेड़छाड़ और उनके बेहिसाब दोहन का सिलसिला जारी है। बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के रूप में इसके नतीजे हम भुगत भी रहे हैं। इंसानों की गलतियों का खामियाजा अब पशु-पक्षियों को भी भुगतना पड़ रहा है।

अफ्रीका और यूरेशिया में भ्रमण करने वाले प्रवासी जल पक्षियों की जनसंख्या में 40 फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक फ्लेमिंगो, क्रेन और राजहंस सरीखे पक्षियों की जनसंख्या में कमी का मुख्य कारण इनके आवास का दोहन बताया गया है।

अफ्रीकन-यूरेशियन वाटरबर्ड एग्रीमेंट [एईडब्ल्यूए] के सचिव बर्ट लेंटन का कहना है कि रिपोर्ट से साफ जाहिर होता है कि प्रवासी जल पक्षियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास करना जरूरी हो गया है। लेंटन के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण प्रवासी जल पक्षियों की कई प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं।

दक्षिणी आल्‍प्‍स की बर्फ में गंभीर कमी

दक्षिणी आल्प्स के ग्लेशियरों में अप्रैल 2007 के बाद से अब तक 2.2 अरब टन बर्फ पिघल चुकी है। जब से ग्लेशियरों की निगरानी शुरू हुई है इसके बाद से यह सबसे अधिक वार्षिक नुकसान है। पिछले 32 वर्षो से न्यूजीलैंड स्थित नेशनल इंस्टीटयूट आफ वाटर एंड एटमॉस्फियरिक रिसर्च [एनआईडब्ल्यू गर्मियों के अंत में एक छोटे विमान की सहायता से दक्षिणी आल्पस के 50 ग्लेश्यिरों का सर्वेक्षण कर रहा है। एनआईडब्ल्यूए के मुख्य वैज्ञानिक जिम सेलिंगर ने कहा कि सर्वेक्षण में लिए गए चित्रों से पता चलता है कि ग्लेशियरों ने पिछले वर्षो की तुलना में इस बार काफी अधिक बर्फ गंवा दी है।

साइंसअल्टर डॉट कॉम वेबसाइट के अनुसार यह न्यूजीलैंड के पास ला नीनो परिस्थितियों, सामान्य से अधिक तापमान और कम बर्फ गिरने का परिणाम है। सेलिंगर ने बताया कि इस वर्ष बर्फ रेखा 130 मीटर ऊपर खिसक गई है। उन्होंने कहा कि यह विश्व में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की घटना के अनुरूप है। स्विट्जरलैंड स्थित विश्व ग्लेशियर मानीटरिंग सर्विस के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1980 के बाद से बर्फ की मोटाई में आधा मीटर प्रतिवर्ष की कमी हो रही है।

Thursday, September 11, 2008

एक टी-शर्ट की धुलाई और पर्यावरण

पर्यावरण को सबसे ज्‍यादा नुकसान पहुंचाने वाले तत्‍वो में ग्रीन हाउस गैसों का स्‍थान सबसे अव्‍वल है। आम घरों में इस्‍तेमाल होने वाली वाशिंग मशीन और रेफ्रिजरेटर भी इसके उत्‍सर्जन में अपना पूरा योगदान देते हैं। लेकिन इन वस्‍तुओं पर हमारी निर्भरता इतनी अधिक बढ़ चुकी है कि इनके बिना जीवन की कोई कल्‍पना भी नहीं करना चाहता. पर्यावरण की रक्षा करने और ग्रीन हाउस गैसों के उत्‍पादन में कटौती करने की वकालत करने वाले लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि ऐसी जीवन शैली विकसित की जानी चाहिए जिससे पर्यावरण को हानि कम से कम पहुंचे।

क्‍या कभी आपने इस बात पर गौर किया है कि यदि हम गंदे कपड़ों को वाशिंग मशीन से धोने की जगह हाथों से धोएं, तो कहीं न कहीं ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने में अपना योगदान देते हैं। यानि हम प्रकारांतर से जलवायु परिवर्तन के खतरे के खिलाफ चल रही लड़ाई का एक हिस्‍सा बन जाते हैं। यानि मशीन की जगह हाथ से कपड़े धोने से ऊर्जा की बचत भी होती है। शोधकर्ताओं ने बताया है कि एक गंदी टी-शर्ट को धोने में जितनी ऊर्जा लगती है, वह उसके निर्माण में लगी ऊर्जा की तीन-चौथाई होती है।

क्वींसलैंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने सूती और पॉलिएस्टर टी-शर्ट्स के निर्माण, इनके इस्तेमाल और नष्ट होने के चरणों में पर्यावरण पर उसके प्रभाव का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि समूचे जीवनकाल में एक टी शर्ट जितना कार्बन उत्पन्न करती है, उसमें से 75 फीसदी उसके मशीन में धुलने के कारण पैदा होता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि हम अपने कपड़ों को मशीन से धोने की जगह हाथ से धोएं तो ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आएगी।

Monday, September 8, 2008

ठंडे मौसम ने बढ़ाई थी जीवन की रफ्तार

हाल में किए गए एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि 50 करोड़ साल पहले मौसम के अचानक ठंडे हो जाने से जीवन के पनपने की रफ्तार बढ़ गई थी। आस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालय के एक दल ने ईल के आकार वाले विलुप्त हो चुके एक समुद्री जीव के जीवाश्मों के अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है। दल ने सूक्ष्म दांतों जैसे आकार वाले इन जीवाश्मों में मौजूद आक्सीजन समस्थानिकों [आइसोटोप] के अनुपात का अध्ययन किया।

अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि जीवाश्म चट्टानों में मौजूद कैल्शियम कार्बोनेट की तुलना में जैव जीवाश्मों के भीतर लंबे समय तक आक्सीजन सुरक्षित बनी रहती है। अध्ययन यह प्रदर्शित करता है कि 49 करोड़ से 47 करोड़ साल पहले समुद्र की सतह 40 डिग्री सेल्सियस तापमान से घटकर उस तापमान पर आ पहुंची जहां आज हमारे ऊष्णकटिबंधीय इलाके हैं। यह नया तापमान लगभग ढाई करोड़ साल तक बरकरार रहा। यही वह समय है जब समुद्री जीवन विस्फोटक रफ्तार से पनपा। दरअसल इतिहास के विकास क्रम में इस दौर को सबसे तेज रफ्तार वाला दौर माना जाता है।

अध्ययन की प्रमुख अनुसंधानी डा जूली ट्राटर ने कहा कि इसके बाद समुद्र हिमनदों के तापमान तक ठंडे हो गए और इसी दौर में अनेक प्रजातियां विलुप्त हो गई। इसका अर्थ हुआ कि मौसम को बदल दिया जाए तो पृथ्वी पर जीवन बदला जा सकता है। जीवाश्मों के जरिये तापमान के रिकार्ड को हासिल करने के लिए दल ने कमरे के आकार वाले एक उपकरण का इस्तेमाल किया जिसे सेंसेटिव हाई रिजोल्यूशन आयन माइक्रोप्रोब या श्रिंप कहा जाता है यह पांच माइक्रान व्यास के अति सूक्ष्म आकार वाले नमूने से भी समस्थानिकों का माप कर सकता है। यह आकार हमारे बालों के दसवें हिस्से के बराबर है।

श्रिंप का इस्तेमाल कर फास्फेट सूक्ष्म जीवाश्मों से आक्सीजन का माप करना वास्तव में एक उपलब्धि है। श्रिंप बेहद आसान और भरोसेमंद तरीके से लाखों करोड़ों साल के दौरान मौसम में हुए बदलावों के बारे में जानकारी देता है। इस तरह से हमें इस बात को समझने में मदद मिल सकती है कि भविष्य में होने वाले मौसमी बदलावों के प्रति जीवन किस प्रकार प्रतिक्रिया करेगा। यह अध्ययन सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका साइंस के ताजा अंक में प्रकाशित हुआ है।

Friday, July 4, 2008

दुनिया बचाने के लिए सुपरमैन होना जरूरी नहीं

बस इसे देखें और सोचें..........


Thursday, July 3, 2008

एवरेस्ट को कचरा मुक्त करेगा चीन

चीन ने माउंट एवरेस्ट पर आवाजाही सीमित करने का फैसला किया है ताकि दुनिया की सबसे ऊँची चोटी को कचरे से मुक्त किया जा सके। इससे पूर्व मई में साम्यवादी नेतृत्व ने पर्वतारोहण के समय को सीमित कर इस 29035 फीट ऊँची चोटी पर पहुँचने वाले दक्षिणी मार्ग को बंद करने के लिए नेपाली सरकार को राजी कर लिया था ताकि चीन विरोधी प्रदर्शनकारी बीजिंग ओलिंपिक मशाल यात्रा में खलल न डाल सकें। इस चोटी पर हुई मशाल यात्रा यानी माउंट कोमोलांग्मा के हफ्तों बाद अब चीन की इस पर्वत से टीन केन बोतलें ऑक्सीजन के कनस्तर और पर्वतारोहियों के बस्ते जैसे सामान को हटाने के लिए विशेष दल भेजने की योजना है।


सरकारी संवाद समिति शिन्हुआ के अनुसार तिब्बती पर्यावरणीय सुरक्षा एजेंसी के नेता झेंग योंग्जे ने कहा कि हमारी यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि एवरेस्ट से बहने वाली नदी का पानी साफ रहते हुए समुद्र में मिले। हमारा उद्देश्य लोगों की छेड़छाड़ से माउंट एवरेस्ट को बचाना है।


इस अभियान को वर्ष 2009 के पहले छह महीने में पूरा करने की योजना है। इसका उद्देश्य हिमालय के इस क्षेत्र की नाजुक पर्यावरणीय परिस्थिति की हिफाजत करना है। इसका एक और मकसद रोंगबक हिमखंड को पिघलने से बचाना है, जो बीते एक दशक में अपने स्थान से 490 फिट पीछे खिसक गया है।


ब्रिटेन के दि इंडिपेंडेंट अखबार के अनुसार सर एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोरगे द्वारा पहली बार विश्व की इस सबसे ऊँची चोटी पर फतह करने के बाद से हजारों पर्वतारोही यहाँ आ चुके हैं। वर्ष 2007 में चीन के उत्तरी ओर से एवरेस्ट पर 40 हजार पर्वतारोही आए। इन्होंने 120 टन कचरा क्षेत्र में छोड़ दिया। लंदन के इस अखबार का कहना है कि वर्ष 2004 में 24 स्वयंसेवियों के दल ने आठ टन कचरा हटाया था। वर्ष 2006 में एक और सफाई दल ने 1.3 टन कचरा एवरेस्ट के क्षेत्र से हटाया।

Friday, May 16, 2008

खतरे की सूची में आया धुवीय भालू

अमेरिकी सरकार ने ध्रुवीय भालू को खतरे में पड़ी प्रजातियों की सूची में डाला है और चेतावनी दी है कि उत्तर धु्रव [आर्कटिक] महासागर में बर्फ पिघलने के कारण वहां उनका आवास खतरे में है। बर्फ पिघलने के रिकार्ड किए गए अभी तक के निम्नतम स्तर से जुड़ीं तस्वीरें उपग्रह से मिलने के बाद गृह मंत्री डर्क केम्पथोर्न ने कहा कि आज मैं ध्रुवीय भालू को खतरे में पड़ी प्रजातियों के कानून [ईएसए] की सूची में डाल रहा हूं। सरकार, वैज्ञानिकों तथा अमेरिकी मत्स्य और वन्यप्राणी सेवा विभाग की सलाह पर कार्य कर रही है।


केम्पथोर्न ने कहा कि ईएसए के कानूनी मानकों ने ध्रुवीय भालू को खतरे में पड़ी प्रजातियों की सूची में डालने को बाध्य किया है, लेकिन मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि इस प्रजाति के कानून की सूची में दर्ज होने से विश्व में जलवायु परिवर्तन या समुद्र में बर्फ पिघलना नहीं रुकेगा। किसी भी बड़े निराकरण के लिए सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को कदम उठाना होंगे। केम्पथोर्न ने अलास्का और ब्यूफोर्ट सी के टापूओं में ध्रुवीय भालुओं पर नजर रखने के लिए बड़े कदम उठाने की बात कही है। उन्होंने विदेशी सरकारों से भी इस प्रजाति के बचाव के लिए सहयोग करने को कहा है।
विश्व में मौजूद कुल 25 000 ध्रुवीय भालुओं की संख्या में से दो तिहाई भालू कनाडा में हैं। इसके बाद भी वहां की सरकार ने इसे खतरे में पड़ी प्रजातियों की सूची में नहीं डाला है। कनाडा की एक पैनल ने पिछले महीने वहां की सरकार से ध्रुवीय भालू को बचाने के लिए कदम उठाने का निवेदन किया था।
इस प्रजाति के प्रति विशेष चिंता जताई गई है लेकिन इसे विलुप्त होने की कगार पर नहीं बताया गया है। केम्पथोर्न ने हालांकि कहा कि अगर ऐहतियात के कदम नहीं उठाए गए तो धुव्रीय भालू के भविष्य में विलुप्ति की कगार पर पहुंचने की संभावना है।